shanigrah se pooree mukti-शनिग्रह से पूरी मुक्ति

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shanigrah se pooree mukti-शनिग्रह से पूरी मुक्ति

shanigrah se pooree mukti-शनिग्रह से पूरी मुक्ति
shanigrah se pooree mukti-शनिग्रह से पूरी मुक्ति

ज्योतिष विचार से Importance of saturn-शनि का महत्व:  शनि न तो पीड़ादायक है और ना ही कष्टदायक, बल्कि भगवान शिव ने उसे जातकों को उनके कर्मों के अनुसार फल देने के लिए नियुक्त किया है| यदि किसी जातक के कर्म निंदनीय और पाप युक्त है, तो शनि देवता उसके फलों में  अशुभता लाकर  उसके कर्मों के लिए दण्डित करता है, यदि जातक के कर्म श्रेष्ठ और प्रशंसनीय है तो उसके फलों को शुभता प्रदान करता है, shanigrah se pooree mukti-शनिग्रह से पूरी मुक्ति के लिए आप नीचे लिखे लेख का अनुकरण करें |

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शनि पाद जानना बहुत जरूरी है:

१) स्वर्णपाद :  अगर जन्म राशि से 1,5,11 स्थानों में गोचरी चंद्र है तो स्वर्णपाद , समस्त सुख के साथ-साथ पारिवारिक सुख की वृद्धि करता है| शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अशुभ है|

२) रजतपाद:  जन्म राशि 2,5,7 स्थानों में यदि चंद्र हो तो वह शनि का रजतपाद है, रजतपाद से मान-सम्मान, सुख-संपत्ति तथा ऐश्वर्य की वृद्धि करता है|

३) ताम्रपाद: जन्म राशि 3,7,10 स्थानों में चंद्र हो तो शनि ताम्रपाद में रहता है| वह जातक को मनवांछित कार्यों में सफलता, धन की वृद्धि, विवाह, पुत्र-सुख, आरोग्य में वृद्धि करता है|

४) लोहपाद: जन्म राशि में 4,8,12 स्थानों में चंद्र हो तो शनि लोहपाद में रहता है इसे नौकरी, व्यापार का नाश, स्त्री, पुत्र एवं पारिवारिक क्लेश और अदालती झगड़े आदि बढतें हैं, कोई अप्रिय दुखद घटना भी घट सकती है|

यह कहना सोचना कि शनि हमेशा अनिष्ट करता है, यह गलत है, शनि ग्रह पदों में अति सम्मानीय है, यह पद अन्य किसी ग्रह को प्राप्त नहीं है, साढ़ेसाती जातक के दोषों को दूर करती है|

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शनि की ढैया:  ढैय्या को संस्कृत में लघु कल्याणी भी कहा जाता है| जब शनि भ्रमण करते हुए जातक की जन्म राशि से चतुर्थ या अष्टम स्थान में प्रवेश करता है तो उसे शनि की ढैया कहते हैं| अर्थात गोचर से 4,8 में शनि भाइयों में विरोध, रोग, चिंता, मृत्यु, अग्नि-भय, दुःख, शस्त्र की चोट, सुख की कमी आदि फल देता है| महर्षि जैमिनी शनि को विशेष प्रभावशाली ग्रह माना है|

शनि के नक्षत्र:  पुष्य, अनुराधा और उत्तरा भाद्रपद इनके नक्षत्र है| इनकी महादशा 19 वर्ष होती है| महादशा और साढेसाती को लोग प्रायः एक रूप में देखते हैं जबकि द्वादश भाव में गोचर वश शनि आते हैं तो साढ़ेसाती शुरू होती है| एक राशि में अन्य ग्रहों की अपेक्षा वह सबसे ज्यादा ढाई वर्ष तक रहते हैं| जन्म समय चंद्रमा जितने अंशो में रहता है उतने ही अंशो में शनि अपनी राशि के द्वादश भाव में प्रवेश करता है तो इसे साढ़ेसाती लगना कहते हैं| यह सिर पर चढ़ती ढैय्या कहलाती है, शनि शूद्र जाति का होने के कारण स्वभाव से मलीन, आलसी और पदोन्नति में बाधक है| मानव शरीर में स्नायु और आंतों को प्रभावित करता है| इसे पाप ग्रह भी कहते हैं|

जन्म राशि से 12,1, 2 स्थानों में शनि हो तो उस जातक के लिए शनि की स्थिति क्रमशः आँख, उदर तथा चरणों में होती है| तीनों को मिलाकर 7:30 वर्ष शनि कष्टदायक होता है जिसे साढ़ेसाती कहते हैं|

साढ़े सात वर्ष में 2700 दिन होते हैं, ज्योतिष विचार से साढ़ेसाती के प्रारंभिक 100 दिनों तक मुख में शनि रहते हैं, जो हानि देने वाले हैं| इसके बाद दाहिनी भुजा पर 400 दिन जो विजय देने वाला होता है< इसके आगे 600 दिनों तक दोनों पैरों में जो भ्रमण कारक हैं, 500 दिनों तक उदर में जो लाभदायक तथा धन-धान्य देने वाला है, इसके 400 दिनों तक बायीं भुजा में, जो दुख देने वाला, 300 दिनों तक सिर पर जो राज्य सुुख देने वाला, आगे 200 दिनों तक नेत्रों में जो सुखदायक होता है| इसके 200 दिन गुदा में जो दुख:दायक होते हैं| इस प्रकार 7:30 वर्षों का फल मुनियों ने कहा है|

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शनि दोष निवारण के उपाय: काले घोड़े की नाल की अंगूठी या नाव की प्रथम किळ की अंगूठी, मध्यमा अंगुली में पहने| शनिवार को काले उड़द का दान करें तथा काले कुत्ते को शनिवार को गुड़ रोटी या इमरती खिलाए| सूखे नारियल और बदाम का दान करें या जल में प्रवाहित करें| शनिवार को पीपल वृक्ष के नीचे दीपक जलाकर उसमें एक चुटकी काला तिल छोड़ें| शनि को प्रणाम करें|

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हनुमान चालीसा, सुंदरकांड का पाठ करें| चांदी के चौकोर टुकड़ा अपने पास रखें| घर में मोर पंख अवश्य रखें और उसका दर्शन रोज करें अर्थात मोर पंख ऐसी जगह रखें जो आते जाते दिखाई दे| नीलम की अंगूठी चांदी में बनवाकर धारण करें| शनिवार को सरसों या तिल के तेल में अपना मुख देखे, उस तेल का दान करें अथवा उस तेल का दीपक, पीपल वृक्ष के पास जलावे| कालभैरवाष्टकं का पाठ करें और काल भैरव बटुक भैरव जी के मंदिर में शनिवार को शराब चढ़ाएं, अपने भोजन में से कौर निकाल कर, सरसों का तेल लगाकर, कुत्ते को खिलाये, ओम नमः शिवाय की 108 की तीन माला का जप करें|

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शिव पर शनिवार को दूध और बेलपत्र तथा काला तिल चढ़ाए एवं महामृत्युंजय का जाप करें| नारियल की खोपड़ी में काला तिल और गुड़ भरकर शनिवार या मंगलवार को घर के बाहर जमीन में गाड़ दे |लोहे के पात्र में सरसों का तेल भरकर देखकर छाया दान करें| शिव का रुद्राभिषेक कराएं, पीपल के वृक्ष की परिक्रमा शनिवार को करें| घर के द्वार पर काले घोड़े की नाल यू शेप में लगावे, ध्यान रहे सब बातों से सर्वोपरि है शिव मंत्र का प्रतिदिन तीन माला का जाप, शनि साढ़ेसाती भी अवस्य पढ़े | शनि चालीसा अवश्य सुने, नीचे दिए लिंक को क्लिक करें और कहीं भी शनि देवता कि चालीसा सुने और प्रभुमय हो जाए|

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शनिग्रह से पूरी शांति
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