Shani saadhesaatee/शनि साढ़ेसाती

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Shani saadhesaatee/शनि साढ़ेसाती

शनि को मित्र बना ले, घबड़ाये नहीं

Shani saadhesaatee/शनि साढ़ेसाती इस अदभुत अध्यात्मिक लेख द्वारा जो ज्योतिष विषय से बिल्कुल अलग है, बहुत संख्या में लोग लाभान्वित हुए हैं|

Shani saadhesaatee/शनि साढ़ेसाती यह शब्द आज के वर्तमान समय में लोगों की मानसिक परेशानियां, व्यर्थ की चिंताये, भय आदि व्यापक रूप से मन को झकझोर देती है, अशांति पैदा कर देती है, ढाई वर्ष, फिर ढाई वर्ष, फिर ढाई वर्ष| इन तीनों को मिलाकर साढे 7 वर्ष का समय शनि के अच्छे-बुरे प्रभाव से लोग परेशान और चिंतित रहते हैं|

लोग अपने राशियों पर आए Shani saadhesaatee/शनि साढ़ेसाती – से भयभीत हो जाते हैं, घबड़ा जाते हैं| साढ़ेसाती 2700 दिनों तक रहती है| शनि-ग्रह बहुत धीमी गति से चलने वाला ग्रह है| शनि एक राशि पर ढाई वर्ष तक रहते हैं इसलिए तीन राशि में भ्रमण करने में उनको ढाई वर्ष X ३ = साढे 7 वर्ष लग जाते हैं| बारह राशियों की परिक्रमा लगभग 30 वर्ष में पूरा करते हैं| शनि का व्यास  2,50,000 मील है| पृथ्वी से ८५ करोड़ मील दूर है| सूर्य से इनकी दूरी 88,00,60,000 मील है| ज्योतिष के मान से 12 राशियों का एक चक्र 29 वर्ष 5 माह 10 दिन 10 घंटे 30 पल में पूरा करते हैं|

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जिस प्रकार माता-पिता को अपने बच्चों से प्यार भरा लगाव होता है, उनसे आत्मीयता-आंतरिक प्रेम रहता है, ठीक उसी प्रकार शनि को अपना मित्र बना ले| मित्रता की भावना रखिए| जब भी आप के ऊपर Shani saadhesaatee/शनि साढ़ेसाती की ग्रहचारी आए, उसे खुशी पूर्वक अपने जीवन में स्वीकार करें| ग्रह आदि जो आकाश मंडल में विचरण कर रहे हैं , वह पंच महातत्व प्रकृति के निर्माण और बदलाव करने की शक्तियां है| यह सब परमात्मा की रचना है| मौसम आदि के फेरबदल करने में यह प्रकृति के सहयोगी होते हैं|

यह याद रखिये कि किसी के रोने चिल्लाने से प्रारब्ध का दुख-भोग मिट नहीं सकता और भारी चाह रखने से, चिंता करने से सुख मिल नहीं सकता| मनुष्य जिस प्रकार चिंतन करता है, जैसा संकल्प करता है, वह वैसा ही बनता है| मनुष्य अज्ञानतापूर्ण कार्य कर उससे अपना भला सोचता है| वह कभी सफल हो नहीं सकता, जैसा बीज बोएगा वैसा फल पाएगा, मनुष्य के जीवन का असली धन है- सद्गुण, उच्च संस्कार और देवी संपत्ति है लेकिन आज मनुष्य अपने भौतिक सुख और इच्छाओं की पूर्ति के लिए अनेक प्रकार की मनोकामनाएं आदि भगवान से मांगते हैं| मनुष्य जो करता है, उसे ही समझता है, यही उसका मूल है, अज्ञानता है| वह केवल विनाशी वस्तुओं की चाह रखता है| जैसे प्रकाश के अभाव को अंधकार कहा जाता है| वैसे ही ज्ञान के अभाव को मोह कहते हैं| संसार सागर में रहते कमल पुष्प के समान उपराम रहिए| जिस प्रकार कीचड़ में रहते कमल को कीचड़ का प्रभाव नहीं पड़ता, वह कीचड़ में रहते हुए भी न्यारा और प्यारा अर्थात कीचड़ से बिल्कुल अलग रहता है| किसी शायर ने ठीक ही कहा है- “दुनिया में हूं दुनिया का तलबदार नहीं, बाजार से गुजरता हूं पर खरीदार नहीं”| सभी मनुष्य आत्माएं संसाररूपी इस स्टेज पर अपना अभिनय अदा कर रही है| शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या व अन्य ग्रहों के उत्पीड़न या भय से छुटकारा पा सकते हैं|जिसका उपाय है शिव बाबा की आराधना उनकी याद| उनका चिंतन, उनसे योग लगाना|

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परमात्मा शिव वा उनकी रचना:

परमात्मा शिव, जिनका न कोई माता है, ना कोई पीता है| वे जन्म-मृत्यु के बंधन में नहीं आते, वह निराकार है, छट्टे तत्व के रहने वाले अजन्मा है, अकाल मूरत है, सारे संसार से न्यारे हैं, विचित्र हैं, जिनका कोई चित्र नहीं है, कल्याणकारी है, आनंद स्वरूप है| जिन्हें सत्यम शिवम सुंदरम कहा गया है| उनका आकार बिंदु रूप है, ज्योतिर्बिंदु स्वरूप शिव ही सभी आत्माओं के रचयिता हैं| जगत उनकी रचना है|आकाश में जितने ग्रहचारी अदि है चाहें सूर्य या चांद या बृहस्पति, मंगल या शनि, राहु-केतु सभी, परमात्मा शिव की सुंदर रचना है| नाटक मंच पर जिस प्रकार आजकल रोशनी के लिए बड़े-बड़े रंग-बिरंगे बल्बों द्वारा स्टेज को प्रकाशित करते हैं, ठीक उसी प्रकार यह चांद आदि सभी ग्रह, आकाश मंडल में रहते हुए हमारे सृष्टि मंच को प्रकाश शक्ति देते हैं और अपना कार्य करते हैं| रात और दिन, यह सब सृष्टि मंच की  आवश्यकता है, उसी प्रकार पांच तत्व भी हमारे सहयोगी है|

सभी जानते हैं, पिता अपने बच्चों का कभी अहित नहीं सोचता, ठीक उसी प्रकार हम पांच तत्वों के सहयोगी हैं| सभी मनुष्य आत्माओं का पिता शिव है जो सदा कल्याण करते हैं, क्यों ना उनका बच्चा नालायक हो? उसका भी हित ही करते हैं, इसलिए कोई भी ग्रहचारी आपको तंग या परेशान नहीं कर सकता, लेकिन आप पूर्णतया, शिव को अपना सच्चा पिता, सगा संबंधी या किसी भी रूप में अपना साथी बना लें| उन्हें दिल से याद करें| परमात्मा द्वारा रची गई ग्रहचारी मेरी हितकारी है, कल्याणी है| सभी परमेश्वर की रचना है, सकारात्मक चिंतन में डालें| निगेटिव विचार का चिंतन या व्यर्थ संकल्पों का चिंतन मन में ना आए| किसी भी ग्रहचारी से घबराएं नहीं| परेशान या चिंतित ना हो| मन में सदा खुशी की उछाल रहें| परमात्मा शिव को अपना साथी, रक्षक, भाई, गुरु समझे, रात-दिन सिर्फ एक ही परमात्मा शिव को याद करें और उनका चिंतन करें| मान-अपमान का ख्याल छोड़ दे, मिला तो अच्छा, ना मिला तो भी अच्छा, जो हो गया वह अच्छा और जो हो रहा है वह सब अच्छा और जो आगे होगा वह भी अच्छा| यह संतुष्टता बनी रहे| क्रोध का नाममात्र का भी प्रवेश न हो| “क्रोध से पानी का भरा घड़ा भी सूख जाता है”, देह अभिमान से दूर रहे|

ऐसा विचार जीवन में चलने से मुक्त रहेंगे| शनि, राहु, केतु, मंगल बाधा पहुंचाने वाले ग्रह आदि आपके मित्र बन जाएंगे|पाप ग्रह भी अपने मित्र की रक्षा करेंगे| इसके बाद भी आप दु:खी रहते हैं तो वह है आपके पिछले जन्मों में किए कर्मों की गति कहा गया है जो बहुत काल के पुराने संस्कार है| यह संस्कार भी शिव की याद करने से मिट जाएगा| शिव को याद करो और परमात्मा की याद का खाता बढ़ाओ| परमात्मा की याद करके अपना सभी कार्य संपन्न करो| आपके अंदर सांस भर जाएगा| आपके शत्रु आपके मित्र बन जाएंगे| सभी रुके कार्य पूर्ण होने लगेंगे| आपका परिवार खुशी से संपन्न हो जाएगा|

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की शांति के लिए, पूजन की जगह, आप उन दु:खी आत्माओं को भोजन कराएं, उनका आशीर्वाद प्राप्त करें | (बिना किसी कामना के) मन के संकल्प को ऊंचा रखें| किसी  को कटु वचन ना बोले| किसी को बिगाड़ने या किसी को बर्बाद करने वाले संकल्प का त्याग करें, किसी को नीचा दिखाने की भावना का भी ख्याल छोड़े| अशुभ विचार या संकल्प छोटी सी चिंगारी है, जो बढ़कर मन को जलाती रहती है| इसलिए अशुभ विचारों और बुरे ख्याल से दूर रहे|

कहते हैं : मृदुल वचन है औषधि, कटुक वचन है तीर, श्रवण द्वार से संचरै, साले सकल शरीर (कबीर )

मीठे वचन बोले, अपना दु:ख भूल, दूसरों के सुख की बातें सोचे| परमात्मा शिव की कृपा से सारी मुसीबतें दूर हो जाएगी| साढ़ेसाती और ढैय्या आपके सहयोगी बन, उन्नति की ओर ले जाएंगे| आपके ऊपर आने वाली मुसीबतें शिवबाबा दूर कर अपने प्यारे बच्चों की रक्षा करेंगे| केवल आप अपने मन से भ्रामक-विचार, भ्रामक-संकल्प का त्याग करें| परमपिता परमात्मा शिव को अपने आपको शरणागत कर दे| साढ़ेसाती क्या, आपकी संपूर्ण जिंदगी खुशीपूर्वक और आनंद के साथ बीतेगी| यह तभी संभव है जब आप ऊपर बताये गए मार्ग को अपने जीवन में अपनाकर उसके अनुरूप बनेंगे |

जैसी स्मृति होती है, वैसी स्थिति बनती है| श्रेष्ठ स्मृति से ही श्रेष्ठ स्थिति बनती है| सबसे श्रेष्ठ स्मृति है परमात्मा की, जो स्वयं को देह से न्यारी आत्मा रूप में अनुभव करने से ही निरंतर बनी रह सकती है| संसार की हर क्रिया, एक विरोधी क्रिया से जुड़ी है| हम स्वास लेते हैं पर लेना जितना जरूरी है, छोड़ना भी उतना ही जरुरी है| हम धन संग्रह करते है, पर धन संग्रह करना जितना जरूरी है, धन का बिसर्जन भी उतना ही जरुरी है| संपत्ति ईश्वर की होती है, उसे मेरा मानने से समस्याए खड़ी होती है| यदि हम एक क्रिया करें अर्थात श्वास ले, छोड़े नहीं, धन संग्रह करें, खर्चे नहीं, निद्रा के आगोश में जाएँ, पर उठे नहीं तो जीवन कैसा होगा?  इस सृष्टि मंच पर पार्ट बजाने आए हैं पर वापस लौटे नहीं तो सृष्टि  का दृश्य कैसा होगा? इसलिए प्रतिदिन के कार्य-व्यवहार  के बीच रहते हुए भी यह याद स्मृति में होनी चाहिए कि मैं आत्मा इस देह में मेहमान हूं, मुझे इस देह को छोड़कर रंगमंच से जाना ही है|

ग्रह जाल में फंसा, लगभग हर इंसान|

कारण केवल एक है, भरा है तनअभिमान||

देह दंभ तज विनत हो, सब शिव पैर करो वार|

क्योंकि दम्भ ही है सभी संघर्षों का द्वार||

सुखमय हो संसार और घर-घर हो मंगलाचार|

परम ज्योति के ध्यान से करो दृष्टि विस्तार ||

Shani saadhesaatee/शनि साढ़ेसाती से कष्ट निवारण के उपाय:

जिसकी शनि की ढैया चल रही हो उस जातक को ३ केला, शिवजी को या  हनुमानजी को भोग लगाकर, आधा केला गाय को खिला दे| दो केला अन्य लोगों को बाँट दे|आधा बचा केला स्वयं खा जाए| ऐसी क्रिया जिनकी ढैया चल रही है उस जातक को प्रत्येक शनिवार को करनी चाहिए| सावधानी यह है कि किसी शनिवार को नागा न हो| किसी कारणवश कोई शनिवार छूट जाए तो आगे का शनिवार बढा ले| इस प्रकार ढाई वर्ष तक प्रत्येक शनिवार को शनि कष्ट निवारण के लिए ढाई केला जो आप दूसरे को दे रहे हैं, यही आपका सर्वश्रेष्ठ भाग्य बना देगा| किसी भी ग्रहचारी की अवस्था में मोर पंख अपने पास रखें और अपने रूम के अंदर रखें और कालभैरव जी की पूजा व मंदिर में जाकर दर्शन करें तथा कालभैरवाष्टकं का पाठ करे और पाठ का YouTube विडियो सुनें, साथ ही शनि से पूरी शान्ति जरुर पढ़े  |

From:
Acharya Sri Mannu Bhaiya,
K23/50, Doodh Vinayak,
Varanasi- 221 001

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