Mahishasura Mardini Stotram

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हिन्दू धर्म में माँ दुर्गा का महत्व

Mahishasura Mardini Stotram (महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रं)- हिन्दू धर्म में माँ दुर्गा का प्रथम स्थान है | जिन्हें शक्ति की देवी कहा जाता है| इनकी तुलना परम ब्रह्म से की गई है| इन्हें जगदंबा भी कहते हैं| इन्हें गुणवती योग माया, बुद्धत्व की जननी बताया गया है| माँ दुर्गा का निरूपण रूप सिंह पर सवार एक देवी के रूप में की जाती है| उन्होंने महिषासुर नामक असुर का वध करने के लिए दुर्गा का रूप धारण किया| नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ शक्तियों को जागृत करने के लिए नवार्ण मंत्र का जप किया जाता है| मां अंबा की नौ रूपों की पूजा होती है इन नौ रूपों को कष्टों का निवारण माना जाता है |

मां दुर्गा भगवान शिव जी की पत्नी पार्वती है| महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रं में मां देवी दुर्गा के रूप का बखान है| यह मंत्र अपने आप में एक अद्भुत मन्त्र है, काफी निराला है | इस मंत्र का नित्य पाठ करने से आपको बड़ा आनंद महसूस होगा और आप स्वयं अपने जीवन में एक अलग आनंद कीअनुभूति करेंगें|

Goddess Durga is being worshipped by the devotees
Mahishasura Mardini Stotram

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रं के पांच लाभ

  1. Mahishasura Mardini Stotram endows with power, wealth, and success over enemies- महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम शत्रुओं पर विजय, कार्य में सफलता और धन की प्राप्ति में मदद करता है |
  2. Mahishasura Mardini Stotram endows strength and security- महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम शक्ति और सुरक्षा प्रदान करता है |
  3. Mahishasura Mardini Stotram brings prosperity into your life- महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम आपके जीवन में समृद्धि लाता है |
  4. Mahishasura Mardini Stotram gives you courage- महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम आपका मनोबल बढाता है |
  5. Mahishasura Mardini Stotram for peace- महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम सुख और शांति देता है |

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Mahishasura Mardini Stotram

अइगिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते,
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते,
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ 1॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते,
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते,
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ 2॥

अइजगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते,
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते,
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥3॥

अइशतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते,
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते,
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥4॥

अइरणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते,
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते,
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥5॥

अइशरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे,
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे,
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥6॥

सम्पूर्ण सुंदरकांड का पाठ करे

अइनिजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते,
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते,
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥7॥

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके,
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके,
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥8॥

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते,
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते,
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥9॥

कालभैरवाष्टकम् स्तोत्रं सुने और हर बाधाओं को दूर करें

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते,
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते,
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥10॥

अइसुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते,
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते,
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥11॥

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते,
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते,
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥12॥

कालसर्प दोष के परिणाम क्या हैं पढ़े और जाने इसकी शांति कैसे करें

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते,
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते,
अइ सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥13॥

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते,
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले,
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥14॥

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते,
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते,
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥15॥

जय अम्बे गौरी के लिरिक्स का आनंद लें

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे,
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे,
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥16॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते,
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते,
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥17॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे,
अइकमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्,
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥18॥

संकष्टी चतुर्थी व्रत, तिथी व पूजा के महत्व को जाने

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्,
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम्,
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥19॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते,
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते,
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥20॥

अइमयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे,
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते,
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते,
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥21॥

जानिये शिव तांडव स्तोत्रम का फल, एक बार सुनने से ही आप रोज़ सुनना चाहेंगे

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रं आनंदमूर्ति गुरूमा की आवाज़ में सुने
Listen to Mahishasura Mardini Stotram in the voice of Anandmurti Gurumaa

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