श्री काशी विश्वनाथ की जय

Kashi Viswanath

काशी की छठा:
युगों – युगों से बहती गंगा, जब गंगोत्री से निकलती हुई हरिद्वार, प्रयाग के रास्ते जब बनारस की धरती को स्पर्श करती है तो उस समय का दृश्य बड़ा अद्भुत होता है, ऐसा प्रतीत होता है कि मानों गंगा भगवान शिव के चरण स्पर्श करने के लिए बेक़रार है| गंगा का यह स्वरूप बड़ा अद्भुत और निराला है| बनारस की घाटों की छटा का यौवन निखर उठता है, सूरज की किरणें भगवान शिव के इस नगरी को भरपूर रोशन करते हुए इसे स्वर्ग सा रूप प्रदान करती हैं, आँखों को खुद पर यह यकीन नही होता कि क्या यह सच है, पर यह सच है क्योंकि यह भगवान शिव की अपनी नगरी है, काशी इसलिए भी विख्यात है क्योंकि उसकी भूमि में भगवान शिव का वास है, कहीं भी जाओ, परंतु काशी जैसी धरती एक अद्भुत संयोग है| यहाँ पैर रखते ही मानव-मन खिलखिला उठता है| ह्रदय के भीतर का यह मन अवश्य इसकी अनुभूति करता है, यह अनुपम है, इस नजारे को हर  काशीवासी पुरे साल देखता है और वह इसका पूरा लुत्फ़ लेता है साथ ही वह स्वयं भी अतिउत्साहित रहता है, शायद ही भारतवर्ष में कोई ऐसी जगह हो, जहां यह नज़ारा साक्षात देखने को मिलता है, यह पवित्र भूमि है बाबा काशी विश्वनाथ की, जो कि अपने आप में रमणीय है, पवित्र है और अति सुखदाई| 


काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास और पौराणिक कथाएं:

उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में स्थित भगवान विश्वनाथ का यह मंदिर, हिंदूओं के प्राचीन मंदिरों में से एक है|काशी को हिन्दूओं का सबसे पवित्र नगर बताया गया है। यहां का मुख्य आकर्षण काशी विश्वनाथ मंदिर है, जिसमें भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग में से प्रमुख शिवलिंग यहां स्थापित है इसका जीर्णोद्धार 11 वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने करवाया था, उसके बाद कई बार मुग़ल शासको द्वारा इसे तोड़ दिया गया और मस्जिद बनवा दिया गया, अंत में अपने वर्तमान रूप में १७८० में इसे इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने बनवाया था। भगवान शिव का यह मंदिर गंगा के पश्चिमी तट पर बसा हुआ है, यह शिव और पार्वती का आदि स्थान रहा है, आदि-लिंग के रूप में अभी मुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग की संज्ञा दी गई है, मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशेष स्थान है| ऐसा मानना है कि एक बार इस पवित्र गंगा में स्नान करने के बाद जो काशी विश्वनाथ बाबा के दर्शन करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है| इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, गोस्वामी तुलसीदास और महर्षि दयानंद जैसे महान हस्तियों का आगमन हुआ था| हिंदू धर्म में कहा जाता है कि प्रलय-काल में इसका विनाश नहीं होता क्योंकि उस समय भगवान शिव इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेतें हैं और सृष्टि कॉल आने पर इसे नीचे उतार देते हैं, सृष्टि स्थली भी यही भूमि बताई जाती है, इसी स्थान पर भगवान श्री विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने की कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और उनके शयन करने के पश्चात उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई थी जिन्होंने इस सृष्टि की रचना की, अगस्त मुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थी और उन्हीं के अर्चना से श्री वशिष्ठ जी तीनो लोको में पूजित हुए थे तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए थे|मान्यता के अनुसार काशी की महिमा ऐसी है कि यहां पर सिर्फ प्राण त्यागने से ही मुक्ति मिल जाती है| इंसान हो या कोई अन्य प्राणी, भगवान भोलेनाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश देते हैं जिससे वह जन्म और मृत्यु के बंधन से छूट जाता है| मत्स्यपुराण  के अनुसार यह मान्यता है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवं दुखों से पीड़ित-जनों के लिए काशी ही एकमात्र गति है| विश्वेश्वर  के आनंद कानन में पांच मुख्य तीर्थ है: दशाश्वमेघ, लोलार्ककुंड, बिंदुमाधव केशव और मणिकर्णिका| दशाश्वमेध इन्हीं से युक्त एक अविमुक्त क्षेत्र माना जाता है|


घाटों का इतिहास:
बनारस में गंगा के किनारे 88 घाट है और अधिकांश घाट पूजा और स्नान आदि समारोह के लिए है जबकि 2 घाटों को श्मशान स्थल के रूप में प्रयोग किया जाता है, अधिकांश वाराणसी के घाटों का पुनर्निर्माण, 1780 के बाद किया गया है, जब यह शहर मराठा साम्राज्य का हिस्सा हुआ करती थी| वर्तमान घाटों के संरक्षक मराठा सिंधिया हैं| भोसले और पेशवा के कई घाट पौराणिक कथाओं से जुड़े हुए हैं, जबकि कुछ निजी स्वामित्व में हैं| इनमें सबसे लोकप्रिय अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट, सिंधिया घाट, मान मंदिर घाट, ललिता घाट, बछराज घाट आदि है| मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट शमशान आदि अनुष्ठान के लिए समर्पित है| यहां औसतन 80-90 शवों का रोजाना दाह-संस्कार किया जाता हैं| मान मंदिर घाट जयपुर के महाराजा जयसिंह द्वितीय ने 1770 में इस घाट का निर्माण करवाया था| ललिता घाट, नेपाल के दिवंगत राजा ने इस घाट को वाराणसी के उत्तरी क्षेत्र में बनवाया था| यह गंगा के शिव मंदिर का स्थान है जहाँ काठमांडू शैली में बना एक लकड़ी का मंदिर है| मंदिर में पशुपति भगवान की छवि है जो भगवान शिव का एक रूप है| संगीत समारोह और खेलो सहित स्थानीय त्योहार नियमित रूप से सुंदर अस्सी घाट पर होते हैं|प्राचीन कथाओ के अनुसार, अग्नि देवता का जन्म यहीं हुआ था| दशाश्वमेध घाट, विश्वनाथ मंदिर के सबसे नजदीक है और यह सबसे शानदार घाट है| बनारस के विभिन्न स्थानों से लोग, इस घाट पर सुबह और शाम को विचरण करने के लिए आतें है, घाटों पर गंगा नदी का यह शहर एक आकर्षक पर्यटक स्थल है, यहां विश्व भर से करीब 10 लाख से अधिक तीर्थ यात्री सालाना आते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार दशाश्वमेघ घाट भगवान ब्रह्मा ने भगवान शिव का स्वागत करने के लिए इसे बनाया था| एक अन्य कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने यहाँ दस अश्वमेध यज्ञ किये थे और उस दौरान 10 घोड़ों की बलि दी थी| पुजारियों का एक समूह प्रतिदिन शाम को यहाँ अग्नि पूजन करता है, जिसमें भगवान शिव, गंगा नदी, सूर्यदेव, अग्निदेव एवं संपूर्ण ब्रह्मांड को आहुतियां समर्पित की जाती हैं। यहां देवी गंगा की भी भव्य आरती की जाती है। मणिकर्णिका घाट के साथ दो कथाएं जुड़ी हुई हैं| एक के अनुसार, भगवान विष्णु ने शिव की तपस्या के दौरान अपने सुदर्शन चक्र से यहां एक कुण्ड खोदा था, कुण्ड खोदने के दौरान आये हुए पसीनेें से भगवान विष्णु ने उसे भर दिया था, जब शिव वहां प्रसन्न हो कर आये, तब विष्णु के कान की मणिकर्णिका उस कुंड में गिर गई थी। दूसरी कथा के अनुसार, भगवान शिव को अपने भक्तों से छुट्टी ही नहीं मिल पाती थी अतः देवी पार्वती इससे परेशान होकर भगवान शिव को रोके रखने हेतु अपने कान की मणिकर्णिका वहीं छुपा दी थी और शिवजी से उसे ढूंढने को कहा। शिवजी उसे कभी ढूंढ नहीं पाये और आज तक जिसकी भी अन्त्येष्टि उस घाट पर की जाती है, भगवान शिव उस मृतक से पूछते हैं कि क्या उसने वह मणिकर्णिका देखी है? प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार, मणिकर्णिका घाट का स्वामी वही चाण्डाल था, जिसने सत्यवादी राजा हरिशचंद्र को खरीदा था। उसने राजा को अपना दास बनाकर उस घाट पर अन्त्येष्टि करने आने वाले लोगों से कर वसूलने का काम दे दिया था। इस घाट की विशेषता यह है कि यहां लगातार हिन्दू अन्त्येष्टि होती रहती हैं व घाट पर चिता की अग्नि लगातार प्रज्ज्वलित रहती है, यह कभी बुझती नहीं। घाट के ऊपर, काशी के कई बड़े प्रभावशाली मंदिर क्षेत्र के इस तंग गलियों में स्थित है|


मंदिरों का शहर काशी:
वाराणसी मंदिरों का शहर है। लगभग हर चौराहे पर एक मंदिर तो मिल ही जायेगा। ऐसे छोटे-छोटे मंदिर स्थानीय पूजा-अर्चना के लिये सहायक होते हैं। इनके साथ ही यहां अनगिनत बड़े मंदिर भी हैं, जो वाराणसी के इतिहास में विभन्न समय पर बनवाये गये थे। इनमें काशी विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, ढुंढिराज गणेश, काल भैरव, दुर्गा जी का मंदिर, संकटमोचन, तुलसी मानस मंदिर, नया विश्वनाथ मंदिर, भारतमाता मंदिर, संकठा देवी मंदिर व विशालाक्षी मंदिर प्रमुख हैं|संकट मोचन मंदिर राम भक्त हनुमान को समर्पित है और स्थानीय लोगों में लोकप्रिय है। यहाँ विभन्न-विभन्न समयों पर कुछ न कुछ कार्यक्रम चलते रहते हैं|।

कला एवं साहित्य एवं काशी नरेश:
वाराणसी, संस्कृति, कला एवं साहित्य से परिपूर्ण है। इस नगर में महान भारतीय लेखक एवं विचारक हुए हैं, कबीर, रविदास, तुलसीदास जी जिन्होंने यहां रामचरितमानस की रचना की| वाराणसी 18वीं शताब्दी में स्वतंत्र काशी राज्य बन गया था और बाद के ब्रिटिश शासन के अधीन, ये प्रमुख व्यापारिक और धार्मिक केन्द्र रहा। साल 1890 में ब्रिटिश प्रशासन ने वाराणसी को एक नया भारतीय राज्य बनाया और रामनगर को इसका मुख्यालय बनाया। काशी नरेश अभी भी रामनगर किले में रहते हैं। ये किला वाराणसी नगर के पूर्व में गंगा के तट पर बना हुआ है। रामनगर किले का निर्माण काशी नरेश राजा बलवंत सिंह ने १८वीं शताब्दी में करवाया था। किला मुगल स्थापत्य शैली में नक्काशीदार छज्जों, खुले प्रांगण और सुरम्य गुम्बददार मंडपों से सुसज्जित बना है। काशी नरेश का एक अन्य महल चैत सिंह महल है। ये शिवाला घाट के निकट महाराजा चैत सिंह ने बनवाया था। रामनगर किला और इसका संग्रहालय अब बनारस के राजाओं की ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित हैं और १८वीं शताब्दी से काशी नरेश का आधिकारिक आवास रहा हैं। आज भी काशी नरेश नगर बनारस के लोगों द्वारा सम्मानित हैं। ये नगर के धार्मिक अध्यक्ष माने जाते हैं और यहां के लोग इन्हें भगवान शिव का अवतार मानते हैं। नरेश नगर के प्रमुख सांस्कृतिक संरक्षक एवं सभी बड़ी धार्मिक गतिविधियों के अभिन्न अंग रहे हैं।

घाटों का पौराणिक महत्व:
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार दशाश्वमेघ घाट भगवान ब्रह्मा ने भगवान शिव का स्वागत करने के लिए इसे बनाया था| एक अन्य कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने यहाँ दस अश्वमेध यज्ञ किये थे और उस दौरान 10 घोड़ों की बलि दी थी| पुजारियों का एक समूह प्रतिदिन शाम को यहाँ अग्नि पूजन करता है, जिसमें भगवान शिव, गंगा नदी, सूर्यदेव, अग्निदेव एवं संपूर्ण ब्रह्मांड को आहुतियां समर्पित की जाती हैं। यहां देवी गंगा की भी भव्य आरती की जाती है। मणिकर्णिका घाट के साथ दो कथाएं जुड़ी हुई हैं| एक के अनुसार, भगवान विष्णु ने शिव की तपस्या के दौरान अपने सुदर्शन चक्र से यहां एक कुण्ड खोदा था, कुण्ड खोदने के दौरान आये हुए पसीनेें से भगवान विष्णु ने उसे भर दिया था, जब शिव वहां प्रसन्न हो कर आये, तब विष्णु के कान की मणिकर्णिका उस कुंड में गिर गई थी। दूसरी कथा के अनुसार, भगवान शिव को अपने भक्तों से छुट्टी ही नहीं मिल पाती थी अतः देवी पार्वती इससे परेशान होकर भगवान शिव को रोके रखने हेतु अपने कान की मणिकर्णिका वहीं छुपा दी थी और शिवजी से उसे ढूंढने को कहा। शिवजी उसे कभी ढूंढ नहीं पाये और आज तक जिसकी भी अन्त्येष्टि उस घाट पर की जाती है, भगवान शिव उस मृतक से पूछते हैं कि क्या उसने वह मणिकर्णिका देखी है? प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार, मणिकर्णिका घाट का स्वामी वही चाण्डाल था, जिसने सत्यवादी राजा हरिशचंद्र को खरीदा था। उसने राजा को अपना दास बनाकर उस घाट पर अन्त्येष्टि करने आने वाले लोगों से कर वसूलने का काम दे दिया था। इस घाट की विशेषता यह है कि यहां लगातार हिन्दू अन्त्येष्टि होती रहती हैं व घाट पर चिता की अग्नि लगातार प्रज्ज्वलित रहती है, यह कभी बुझती नहीं। घाट के ऊपर, काशी के कई बड़े प्रभावशाली मंदिर क्षेत्र के इस तंग गलियों में स्थित है|


मंदिरों का शहर काशी:
वाराणसी मंदिरों का शहर है। लगभग हर चौराहे पर एक मंदिर तो मिल ही जायेगा। ऐसे छोटे-छोटे मंदिर स्थानीय पूजा-अर्चना के लिये सहायक होते हैं। इनके साथ ही यहां अनगिनत बड़े मंदिर भी हैं, जो वाराणसी के इतिहास में विभन्न समय पर बनवाये गये थे। इनमें काशी विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, ढुंढिराज गणेश, काल भैरव, दुर्गा जी का मंदिर, संकटमोचन, तुलसी मानस मंदिर, नया विश्वनाथ मंदिर, भारतमाता मंदिर, संकठा देवी मंदिर व विशालाक्षी मंदिर प्रमुख हैं|संकट मोचन मंदिर राम भक्त हनुमान को समर्पित है और स्थानीय लोगों में लोकप्रिय है। यहाँ विभन्न-विभन्न समयों पर कुछ न कुछ कार्यक्रम चलते रहते हैं|।

कला एवं साहित्य एवं काशी नरेश:
वाराणसी, संस्कृति, कला एवं साहित्य से परिपूर्ण है। इस नगर में महान भारतीय लेखक एवं विचारक हुए हैं, कबीर, रविदास, तुलसीदास जी जिन्होंने यहां रामचरितमानस की रचना की| वाराणसी 18वीं शताब्दी में स्वतंत्र काशी राज्य बन गया था और बाद के ब्रिटिश शासन के अधीन, ये प्रमुख व्यापारिक और धार्मिक केन्द्र रहा। साल 1890 में ब्रिटिश प्रशासन ने वाराणसी को एक नया भारतीय राज्य बनाया और रामनगर को इसका मुख्यालय बनाया। काशी नरेश अभी भी रामनगर किले में रहते हैं। ये किला वाराणसी नगर के पूर्व में गंगा के तट पर बना हुआ है। रामनगर किले का निर्माण काशी नरेश राजा बलवंत सिंह ने १८वीं शताब्दी में करवाया था। किला मुगल स्थापत्य शैली में नक्काशीदार छज्जों, खुले प्रांगण और सुरम्य गुम्बददार मंडपों से सुसज्जित बना है। काशी नरेश का एक अन्य महल चैत सिंह महल है। ये शिवाला घाट के निकट महाराजा चैत सिंह ने बनवाया था।

रामनगर किला और इसका संग्रहालय अब बनारस के राजाओं की ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित हैं और १८वीं शताब्दी से काशी नरेश का आधिकारिक आवास रहा हैं। आज भी काशी नरेश नगर बनारस के लोगों द्वारा सम्मानित हैं। ये नगर के धार्मिक अध्यक्ष माने जाते हैं और यहां के लोग इन्हें भगवान शिव का अवतार मानते हैं। नरेश नगर के प्रमुख सांस्कृतिक संरक्षक एवं सभी बड़ी धार्मिक गतिविधियों के अभिन्न अंग रहे हैं।