नवग्रह स्तोत्रं

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Navgrah Stotram

Navgrah Stotram - नवग्रह स्तोत्रं
Navgrah Stotram – नवग्रह स्तोत्रं

नवग्रह स्तोत्रम के जप का लाभ
नवग्रह स्तोत्रं का जप करने वालों से सभी देवता प्रसन्न रहते हैं, ज्योतिष के अनुसार इस पूरे ब्रह्मांड में नौ ग्रह मौजूद हैं, उनके अनुसार सौर्यमंडल में पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, शुक्र, शनि, राहु और केतु इन सबको मिलाकर  नौ-ग्रह हैं, ये मनुष्यो की हर एक इच्छाओं को तृप्त करने में  सहायक हैं, शांति के लिए आपको इनके हर एक मंत्र का 108 बार जप करना होगा तो इससे आपके दोष दूर होंगे, नवग्रह मंत्र का जप करने के लिए विधि-विधान से स्नानादि से निवृत्त होकर, एक सफेद आसन पर बैठ जाएं आसन की नीचे थोड़ा चावल भी रख ले:

१) विश्व की रक्षा करने वाले भगवान सूर्य मेरी पीड़ा का हरण करें |
२) अमृत रूपी शरीर वाले तथा अमृत का पान करने वाले चंद्रदेव, मेरी पीड़ा को दूर करें |
३) जगत को दृष्टि देने वाले मंगल देवता जी, मेरे ग्रह-दोष को दूर करें |
४) चंद्रमा के पुत्र बुध, मेरे पीरा का हरण करें |
५) सर्वदा लोक-कल्याण में नीरज रहने वाले विश्वदेव गुरु बृहस्पति मेरी पीड़ा  का हरण करें |
६) हे सूर्यपुत्र भगवान शनि देव, हमारी पीड़ा को दूर करें |
७) विविधरूप तथा वर्ण वाले राहु-देव  मेरी पीड़ा का हरण करें |

नवग्रह स्तोत्र ं का जप करने से, इस ब्रह्मांड में स्थित समस्त नौ-ग्रह, सभी शांत रहते हैं और प्रसन्न होकर जप करने वालें को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं |

Navgrah Stotram

|| अथ नवग्रह स्तोत्रं ||
|| श्री गणेशाय नमः ||

जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महद्युतिं
तमोरिसर्व पापघ्नं प्रणतोस्मि दिवाकरं-(रवि)

दधिशंख तुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवं
नमामि शशिनं सोंमं शंभोर्मुकुट भूषणं-(चंद्र)

धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कांतीं समप्रभं
कुमारं शक्तिहस्तंच मंगलं प्रणमाम्यहं-(मंगळ)

नवग्रह स्तोत्रं

प्रियंगुकलिका शामं रूपेणा प्रतिमं बुधं
सौम्यं सौम्य गुणपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहं-(बुध)

देवानांच ऋषिणांच गुरुंकांचन सन्निभं
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिं-(गुरु)

हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरूं
सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहं-(शुक्र)

नीलांजन समाभासं, रविपुत्रं यमाग्रजं
छायामार्तंड संभूतं तं, नमामि शनैश्वरं-(शनि)

Navgrah Stotram

अर्धकायं महावीर्यं, चंद्रादित्य विमर्दनं
सिंहिका गर्भसंभूतं, तं राहूं प्रणमाम्यहं-(राहू)

पलाशपुष्प संकाशं, तारका ग्रह मस्तकं
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं, केतुं प्रणमाम्यह-(केतु)

फलश्रुति :
इति व्यासमुखोदगीतं य: पठेत सुसमाहितं |
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्न शांतिर्भविष्यति |

नवग्रह स्तोत्रं

नर,नारी, नृपाणांच भवेत् दु:स्वप्न नाशनं |
ऐश्वर्यंमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनं |
ग्रहनक्षत्रजा: पीडास्तस्कराग्नि समुद्भवा |
ता: सर्वा: प्रशमं यान्ति व्यासो ब्रुतेन संशय: |
| इति श्री व्यास विरचित आदित्यादि नवग्रह स्तोत्रं संपूर्णं |

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