देवी कात्यायनी

देवी कात्यायनी- Puja at its peak now, the best is yet to come in 2020

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Goddess Katyayani

देवी कात्यायनी

नवरात्रि में षष्टी तिथी का महत्व: शारदीय नवरात्र का आज छठा दिन है| नवरात्रि के छठवें दिन (षष्टी) तिथी को देवी कात्यायनी की पूजा का विशेष महत्व है| पुराणों के अनुसार, प्राचीन काल में महर्षि कात्यायन ने वर्षो तक भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की थी कि माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें|

जिसे माँ भगवती ने स्वीकार कर लिया| कुछ समय पश्चात जब महिषासुर का प्रकोप पृथ्वी पर काफी बढ़ गया| तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने मिलकर अपने तेज से महिषासुर जैसे दानव का समूल नाश करने के लिए एक देवी शक्ति को उत्पन्न किया| सभी देवताओं ने मिलकर देवी कात्यायनी को अपना अंश प्रदान किया और उसके बाद उन्हें शस्त्रों से सुसोभित किया|

देवी कात्यायनी

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शस्त्रों की अनुपम भेंट: भगवान शिव ने माता को एक त्रिशूल भेंट किया| भगवान विष्णु ने उन्हें सुदर्शन चक्र दिया| वरुणदेव ने उन्हें एक शंख दिया, अग्नि ने अपनी शक्ति प्रदान की, वायु ने धनुष-वाण दिया, सूर्य ने उन्हें अपना तेज़ प्रदान किया| देवराज इंद्र ने देवी को वज्र और घंटा अर्पित किये, कुबेर ने उन्हें एक दिव्य गदा भेंट की|

ब्रह्मा ने उन्हें एक माला और कमंडल दिया, विश्वकर्मा जी ने उन्हें एक कुल्हाड़ी भेंट की, यमराज ने उन्हें कालदंड भेंट किये, प्रजापति दक्ष ने स्फटिक की माला प्रदान की, कुबेरदेव ने शहद से भरा पात्र दिया, पर्वतराज हिमालय ने माता को सवारी के लिए शक्तिशाली व दिव्य शेर भेंट किये, समुद्रदेव ने वस्त्र, आभूषण, चूड़ामणि, कुंडल व रत्नों के अनुपम अलंकार भेंट में दिए|

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देवी कात्यायनी का दिव्य स्वरुप: देवी कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्कर है| देवी कात्यायनी के चार हाथ है| माँ के दाहिने दोनों हाथो में एक में वर मुद्रा तथा दुसरे में अभय मुद्रा है तथा बाएँ दोनों हाथो में तलवार और कमल पुष्प है| देवी कात्यायनी नकारात्मक और अहंकार के विनाश का प्रतीक है|

वह शक्ति की आदि स्वरूपा है| जिनकी प्रथम पूजा महर्षि कात्यायन ने की और यही वजह है कि उनका नाम कात्यायनी पड़ा| देवी कात्यायनी की भक्ति से मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम मोक्ष इत्यादि फलों की प्राप्ति होती है| इनके पूजन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है|

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आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीनो दिन उन्होंने कात्यायन ऋषि से पूजा ग्रहण करने के पश्चात दशमी को उन्होंने महिषासुर का संहार कर दिया। देवी कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। इनके पूजन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है| वे अपने भक्तों को दुश्मनों का संहार करने में सक्षम बनाती हैं। इनका ध्यान गोधुली बेला में करना होता है|

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देवी कात्यायनी की पूजन का महत्व: माँ कात्यायनी की पूजा से कुंवारी कन्याओं के विवाह में आ रही विपदाओं का अंत होता है और उन्हें एक सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है तथा उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में आ रही विपदाओं से मुक्ति मिलती है और उनका जीवन सरल और सुगम बन जाता है जिससे उन्हें मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है|

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी कात्यायनी बृहस्पति गृह का सञ्चालन करती हैं| अतः जिन भक्तों के ऊपर बृहस्पति ग्रह का प्रकोप है, उन्हें माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है| साथ ही राहू, केतु व काल सर्प योग के दोष को भी माता दूर करती है| देवी कन्याकुमारी, देवी कात्यायनी का ही अवतार हैं और तमिलनाडु में पोंगल के दौरान उनकी पूजा का विधान है|

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देवी कात्यायनी की पूजा करने की विधि: एक स्वच्छ चौकी ले| जिसे गंगाजल से साफ कर ले| उसके बाद उस पर लाल कपड़ा बिछाए और देवी कात्यायनी की प्रतिमा या फोटो रक्खे| चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के कलश में जल भरकर रख ले| उसी चौकी पर श्री गणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका (16 देवी) का घर बनाये और इनकी स्थापना करें|

वैदिक मंत्रों द्वारा देवी कात्यायनी सहित समस्त स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करें और चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्बा, बेलपत्र, आभूषण, पुष्टाहार, सुगंधित द्रव्य, धूप, दीप, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा मंत्र तथा पुष्पांजलि आदि करें| माँ को लाल जवाफूल की माला ही पहनाएं तथा पूजा में शहद और बेलपत्र अवश्य चढायें और निम्नलिखित मंत्रो से देवी कात्यायनी का आवाहन करें|

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या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

वैदिक मंत्र
वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृत शेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥
स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थिताम् षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम्॥
माँ का स्तोत्रं
कञ्चनाभां वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखी शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोऽस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्।
सिंहस्थिताम् पद्महस्तां कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्वाचिन्ता, विश्वातीता कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
कां बीजा, कां जपानन्द कां बीज जपतोषिते।
कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥
कांकार हर्षिणी कां धन दाधनमासना।
कां बीज जपकारिणी कां बीज तप मानसा॥
कां कारिणी कां मन्त्रपूजिता कां बीज धारिणी।
कां कीं कूंकै क: ठ: छ: स्वाहा रूपिणी॥

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इसके पश्चात देवी मां को प्रसाद भोग लगायें| प्रसाद में माता को छेने की मिठाइयाँ भोग लगायें तथा लौकी से बनी मिठाइयाँ भी भोग में रक्खे| प्रसाद के बाद पान, सुपारी भेंट करें और प्रदक्षिणा करें| कम से कम 3 बार अपने ही स्थान पर खड़े होकर घूमें। प्रदक्षिणा के बाद घी व कपूर के दीपक से देवी कात्यायनी की आरती करें। माँ की विशेष आराधना के लिए महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रं का पाठ सुने और महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रं पाठ के लाभ के बारे में जाने| जय अम्बे गौरी आरती से माता की आरती करें और दुर्गा चालीसा सुने|

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