दिशाशूल

यात्रा से पहले दिशाशूल को पहचाने

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यात्रा-मुहूर्त की असली वजह

दिशाशूल – हिंदू धर्म में किसी भी महत्वपूर्ण कार्य करने के पहले, हम मुहूर्त के बारे में अवश्य विचार करते हैं | शादी व्याह हो या मुंडन, अथवा जनेऊ या घर, ऑफिस का उद्घाटन, सभी क्षेत्र में हम पहले मुहूर्त पर विचार करते हैं, उसके पश्चात हम अगला कदम उठाते हैं | उसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यह है कि शुभ मुहूर्त के अनुसार जो वक्त निकाला जाता है, वह वक्त निकालने के तौर तरीके हमारी संस्कृति में मौजूद है और वह बिलकुल सही होता है, अतः जिस कार्य से हमे सफलता प्राप्त हो, हमें अपने हर कार्य उसी अनुरूप करना चाहिए |

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दिशाशूल- पुराने जमाने में हमारे पास मोबाइल बगैरह नहीं हुआ करते थे या हमें समझ नहीं थी अतः हम जल्दबाजी में यात्रा कर लिया करते थे, लेकिन अब तो सारे साधन उपलब्ध हैं| हमारे आपके घर में इंटरनेट है, हम बहुत आसानी से देख सकते हैं और उसी हिसाब से यात्रा कर सकते हैं| हमे इन सबका भरपूर लाभ लेना चाहिए|

ठीक यही सोच रखते हुए, हमारे पूर्वजों ने यात्रा के लिए भी कुछ नियम और कायदे बनाये है| जिसका हम अनुशरण करते है ताकि हम यदि बाहर की यात्रा कर रहे हो तो हमें उसका ज्यादा से ज्यादा लाभ मिले और हमारी यात्रा पूर्णतया शुभ और मंगलमय हो, चाहे भले ही वह यात्रा तीर्थाटन के लिए हो हालाँकि जब हम अपने परिवार या बिज़नेस के लिए बाहर जातें है तो

हमे अवश्य ही दिशाशूल तथा चौघडिया के अनुसार ही यात्रा करनी चाहिए ताकि हमारे साथ कोई दुर्घटना न हो और यदि यह यात्रा बिज़नेस के लिए हो तो भी यह जरुरी हो जाता है कि हम इसका ज्यादा से ज्यादा लाभ ले सकें, आगे हम टेक्निकल मुद्दों पर जाना चाहेंगे ताकि आप स्वंय अपनी यात्रा की तिथि निकाल सकें |

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यात्रा मुहूर्त के लिए शुभ तिथि

दिशाशूल, नक्षत्र-शूल, योगिनी, भद्रा, चंद्रमा, तारा, शुभ-नक्षत्र, शुभ तिथि इत्यादि का विचार किया जाता है |
शुभ तिथि– भद्रादि दोषरहित 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 तथा कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा शुभ नक्षत्र– अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, श्रवन, धनिष्ठा, रेवती
सर्व दिग्गमन नक्षत्र– अश्विन, पुष्य, अनुराधा और हस्त |
मध्य नक्षत्र– रोहिणी, तीनों उत्तरा, तीनों पुर्वा, ज्येष्ठा, मूल एवं शतभिषा
शुभ होरा– चंद्र, बुध, गुरु और शुक्र का होरा

शुभ चंद्र -जन्म राशि से गिनने पर 1, 3, 6, 7,10, 11वीं राशि का चंद्र शुभ होता है| इसके अलावा शुक्ल पक्ष में 2, 5, 9वीं राशि का भी चंद्र शुभ होता है |

शुभ तारा– जन्म नक्षत्र से दिन नक्षत्र तक गिनने पर जो संख्या आए उसे 9 से भाग दे, शेष 1, 2, 4, 6, 8, 0 बचे तो शुभ है |

यात्रा में शुभाशुभ लग्न– कुंभ या कुंभ के नवांश में यात्रा कभी न करें | शुभ लग्न वह है जिसमें 1, 4, 5, 7, 10 स्थानों में शुभ ग्रह और 3, 6, 10, 11 में पाप ग्रह हो | अशुभ लग्न वह है जिसमें चंद्रमा 1, 6, 8, 12वें हो अथवा किसी भी पाप ग्रह से युक्त हो | शनि 10वें, शुक्र 6, 7, 8, 12वें लग्नेश होंं |

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दिशाशूल
सोम शनीचर पूरब न चालू | मंगल बुध उत्तर दिशी कालू ||
रवि शुक्र जो पश्चिम जाए | हानि होय पथ सुख नहीं पाय ||
बिफे दक्खिन करें पयाना | फिर नहीं समझे ताको आना ||

सोम, शनि को पूर्व, सोम गुरु को अग्नि-कोण, गुरु को दक्षिण, रवि शुक्र को नैॠत्य और पश्चिम, मंगल का वायव्य, उत्तर, बुध-शुक्र को ईशान कोण में वार दिशाशूल होने के कारण यात्रा ना करें |

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काल-राहु का वास– शनिवार को पूर्व, शुक्रवार को अग्नि कोण, गुरुवार को दक्षिण, बुधवार को नैॠत्य, मंगल को पश्चिम, सोमवार को वायव्य, रविवार को उत्तर दिशा में काल-राहु का वास रहता है | सम्मुख ( यात्रा की दिशा में ) काल-राहु नेस्ट है | अतः जिस वार को यात्रा की दिशा में काल-राहु का वास हो, उसे त्याग दें |

नक्षत्र शूल– पूर्व में जेष्ठा, पू. षा., उ.षा. दक्षिण में विशाखा, श्रवण, पू. भा. पश्चिम में रोहिणी पुष्य मूल उत्तर पू. फा. हस्त, विशाखा नक्षत्र-शूल है | यात्रा दिशा के शूल नक्षत्रों में कभी न करें | दक्षिण दिशा की यात्रा में पंचक-नक्षत्र धनिष्ठा, शत., पू. भा., उ.भा. रेवती वर्जित है |

योगिनि-वास की तिथियाँ– 1, 9 को पूर्व, 3, 11 को अग्निकोण, 5, 13 को दक्षिण, 4, 12 को नैॠत्य, 6, 14 को पश्चिम, 7, 15 को वायव्य, 2, 10 को उत्तर, 8, 30 को ईशाान में योगिनी का वास रहता है | यात्रा में सम्मुख तथा दाहिने दिशा की योगिनी अशुभ है | बायेें और पीछे की योगिनी शुभ होती है |

चंद्र-दिशा-यात्रा- में सम्मुख या दाहिने ( दिशा मेें ) शुभ होता है | पीछे होने से मृत्यु और बाई ओर होने से हानि होती है | चंद्रमा की दिशा उसकी तत्कालीन राशि से जानी जाती है | यथा-

मेष सिंह, धन, पूरब चंदा | दक्खिन, कन्या, बृष, मकरंदा ||
पश्चिम-कुंभ, तुलाये, मिथुना | उत्तर, कर्क, वृश्चिक मीना ||

अर्थात्- मेष, सिंह और धनु राशि का चंद्रमा पूर्व में, बृष, कन्या और मकर राशि का दक्षिण में, मिथुन, तुला और कुंभ राशि का पश्चिम में, कर्क, वृश्चिक और मीन राशि का चंद्रमा उत्तर में रहता है |

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समय-शूळ– उषाकाल के पूर्व, गोधूळि में पश्चिम, अर्धरात्रि में उत्तर, मध्यान्न काळ दक्षिण को नहीं जाना चाहिए | योगिनी वास का चक्र देखें | ताकि पाठकगण सरलता से यात्रा का शुद्ध मुहूर्त निकाल सकें |

प्रस्थान विधान– यदि किन्हीं जरूरी कारणों से यात्रा के मुहूर्त में ना जा सके तो उसी मुहूर्त में ब्राह्मण-जनेऊ, माला, क्षत्रिय शस्त्र, वैश्य शहद, घी, शूद्र फल को अपने वस्त्र में बांधकर किसी के घर में नगर के बाहर जाने की दिशा में प्रस्थान रखें | उपर्युक्त चीजों के बजाय, मन की प्यारी वस्तु को भी प्रस्थान में रख सकते हैं |

यात्रा के पहले त्याज्य वस्तुएं– यात्रा के 3 दिन पहले दूध, 5 दिन पहले हजामत, 3 दिन पहले तेल, 7 दिन पहले मैथुन त्याग देना चाहिए यदि इतना ना हो सके तो कम से कम 1 दिन पहले तो ऊपर की सब त्याज्य वस्तुओं को अवश्य छोड़ दे |

रवि को पान खाकर, सोम को शीशे में मुंह देखकर, मंगल को गुड़, बुध को धनिया, गुरु को जीरा, शुक्र को दही और शनि को अदरक खाकर यात्रा करने से कार्य सफल होता है |

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यात्रा के पहले ग्राह्य वस्तुएँ

रवि को पान, सोम को दर्पण, मंगल को गुुड़ करिए अर्पण |
बुध को धनिया, बीफे जीरा, शुक्र कहें मोहि दाधि को पीरा |
कहे शनि मैैं अदरख पावा, सुख संपत्ति निश्चय घर लावा |

Yatra 24W
दिशासूल नक्षत्र तथा योगिनी-वास का चक्र

|| चौघड़िया मुहूर्त ||

श्रेष्ठ चौघड़िया-अमृत, चर, लाभ, शुभ

दिशाशूल– शीघ्रता में कोई भी यात्रा-मुहूर्त ना बनता हो या एकाएक यात्रा करने का मौका आ पड़े तो उस अवसर के लिए विशेष रूप से चौघड़िया मुहूर्त का उपयोग है |

दिन और रात के आठ-आठ बराबर हिस्से का एक-एक चौघड़िया मुहूर्त होता है| जब दिन और रात बराबर, यानी 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात होती है तब एक चौघड़िया-मुहूर्त डेढ़ घंटा या पौने चार घटी का होता है | इसलिए इसका नाम चौघड़िया मुहूर्त पड़ा |

रविवार, सोमवार आदि प्रत्येक वार, सूर्योदय से शुरू होकर अगले दिन सूर्योदय पर समाप्त होता है एवं उसी समय से अगला ‘वार’ प्रारंभ हो जाता है, प्रत्येक बार सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय उस ‘वार’ का दिनमान और रात्रिमान न्यूनाधिक भी ( यानि दिन-रात छोटे-बड़े ) हुआ करते हैं | पर वार हमेशा 24 घंटे यानि 60 घटी का होता है | अर्थात् दिनमान और रात्रिमान का योग जानना हो तो उस रोज के दिनमान को 60 घटी होने पर रात्रिमान निकल आएगा |

अब जिस रोज के दिन यात्रा करनी हो तो उस रोज के दिनमान के अष्टमांस घटी-पल का घंटा मिनट बनाकर उस रोज के सूर्योदय समय में जोड़ते जावे तो क्रमशः उस दिन की आठों चौघड़िया के समय ज्ञात होते जाएंगे | उन आठों चौघड़िया में कौन सा ग्राह्य और त्याज्य है, यह ऊपर ‘दिन’ चौघड़िया के चक्र में उस दिन के वार के सामने के खाने में देख कर जान ले |

इसी प्रकार जिस रोज रात्रि में यात्रा करनी हो तो उस रोज को रात्रिमान अष्टमांस घटी-पल का घंटा मिनट बनाकर सूर्यास्त समय में जोड़ते जाने से क्रमशः रात को प्रत्येक चौघड़िया का समय ज्ञात हो जाएगा और उनका शुभाशुभत्व उपर्युक्त रात की चौघड़िया के चक्र में उस रोज के वार के सामने खाने में देख कर जान ले |

श्रेष्ठ समय शुभ, चर, अमृत और लाभ की चौघड़िया का है | अशुुुभ समय उद्वेग, रोग और काल का होता है, इनको त्याग देना चाहिए | अड़ाई घटी का एक घंटा तथा अड़ाई पल का 1 मिनट होता है | अतः घटी-पल का घंटा मिनट बनाने के लिए उसमे 5 का भाग देकर लब्धि को दूना कर ले-

किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करने के पहले राहुकाल 2021 के वक़्त का अध्ययन करें

चौघड़िया मुहूर्त को पहचाने

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Raat Ki Choghadia
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जिस चौघड़िये का स्वामी जिस दिशा में दिशाशूल का कारक हो उस दिशा में यात्रा करना प्रतिबंधित माना गया है। अतः सामान्य रूप से चौघड़िया मुहूर्त उत्तम और अभीष्ट फलदायक होते हैं।

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