आरती कुंजबिहारी की- Best Lord Shree Krishna Aarti

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आरती कुंजबिहारी की

आरती कुंजबिहारी की : श्रीमद्भागवत के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग में, भाद्रपद माह में कृष्ण पक्ष के रोहिणी नक्षत्र में हुआ था | उन्होंने भगवान श्री विष्णु के दसवें अवतार के रूप में कुछ ख़ास उद्देश्य की पूर्ति हेतु, इस पृथ्वी पर जन्म लिया था | कृष्ण के समकालीन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भागवत और महाभारत में श्री कृष्ण के चरित्र विस्तुत रूप से उल्लेख किया है। हिन्दू धर्म में हर कोई नित्य नियम से भगवान श्री कृष्ण जी की पूजा करते हैं |

श्री रामचंद्र कृपालु भजमन सुने

कृष्ण के जन्म की खुशी के उपलक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार भी मनाया जाता है और यह हिन्दुओं का सबसे महत्वत्वपूर्ण त्यौहार है | यह प्राचीन काल से चला आ रहा है | हर हिन्दू इस पुरे दिन उपवास रखतें हैं और रात में लोग अपने-अपने घरों में भगवान बालकृष्ण के जन्म का उत्सव बड़े आनंदपूर्वक मनाते हैं | कृष्ण जन्माष्टमी पर रोशनी से घर का कोना कोना जगमगा उठता है, ठीक वैसे ही जैसे घर में किसी नए मेहमान ने जन्म लिया हो | ख़ुशी से लोग भगवन बल-गोपाल को झूले झुलाते हैं |पंचामृत से भगवान को स्नान कराया जाता है | चन्दन और रोली से भगवान का टिका किया जाता है |

भगवान श्री कृष्ण को यशोदा और नंद ने पाला और उनका जन्म गोकुल में ही व्यतीत हुआ | बाल्यकाल में उन्होंने बड़े-बड़े कार्य किए जो कि किसी मनुष्य के लिए संभव नहीं था | उन्होंने कंश का वध किया, पूतना जैसी कई राक्षस व राक्षसीन को मारा | द्वारका नगरी की स्थापना की और वहां अपना राज्य बसाया | उन्होंने महाभारत के युद्ध में पांडवों की मदद की और विभिन्न विपत्तियों से उनलोगों की रक्षा की | महाभारत के युद्ध में उन्होंने अर्जुन के सारथी की भूमिका अदा की और रणक्षेत्र में अकेले होते हुए भी उन्होंने उस युद्ध को जीता | महाभारत में इसका विस्त्रित्त विवरण है |

वैष्णव धर्म से जुड़े लोग कृष्ण जन्माष्टमी दुसरे दिन मानते हैं, हालाँकि वे भगवान श्री कृष्ण की पूजा प्रमुख रूप से हर दिन सुबह-शाम करते हैं | यहाँ तक की वे भगवान कृष्ण की सेवा, उन्हें अपने बच्चेें की तरह समझते हुए करते है, परन्तु इस ख़ास दिन का इंतज़ार उन्हें सदैव रहता है | आधी रात में, वे भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हुए सारी रात भजन-कीर्तन में लगे रहते हैं ।

कुंजबिहारी जी की आरती

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै ।
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा,
स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव सीस,
जटा के बीच, हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की,
॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू, हंसत मृदु मंद,
चांदनी चंद, कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की,
॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

Aarti Kunj Bihari Ki

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